फ़ासले भी तुमने ही बनाए,
और अपनापन भी तुम ही जताते हो।
कैसी अजीब रिवायत है तुम्हारी,
ज़ख़्म भी देते हो, और मरहम होने का दावा भी करते हो।
हम तो केवल....
बस ख़ामोशी से मुस्कुरा देते हैं।
-संजय श्रीवास्तव
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