ले दे का संसार
मुखड़ा
श्वास से श्वास से निर्मित जीवन,
ले-दे से संसार।
लेकर आए, देकर जाएँ,
यही जगत व्यवहार।
श्वास से श्वास से निर्मित जीवन,
ले-दे से संसार।
अंतरा १
मुट्ठी भींचे आए जग में,
रीते हाथ चलेंगे।
धूप-छाँव के इस मेले में,
कितने संग रहेंगे?
जितना पाया, उतना बाँटो,
यही प्रेम का सार।
लेकर आए, देकर जाएँ,
यही जगत व्यवहार।
अंतरा २
श्वास मिली तो गीत बना लो,
दर्द मिला तो गाओ।
गिरते-गिरते राह मिले तो,
हँसकर कदम बढ़ाओ।
पल-पल ढलता जीवन अपना,
मत करना बेकार।
लेकर आए, देकर जाएँ,
यही जगत व्यवहार।
अंतरा ३
लेना ही यदि सीख लिया तो,
मन होगा कंगाल।
देने में जो सुख मिलता है,
वह सुख बने मिसाल।
दीप जले तो दीप जलाओ,
बढ़ जाए उजियार।
कहे निराला, प्रेम लुटाओ,
यही जगत व्यवहार।
मुखड़ा
श्वास से श्वास से निर्मित जीवन,
ले-दे से संसार।
लेकर आए, देकर जाएँ,
यही जगत व्यवहार।।
- संजय निराला
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