हरकारा
मुखड़ा
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को।
राग-द्वेष मन में ना कोई,
बने सहारा सबको॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा १
तन की अपनी गठरी लेकर,
किया हवाले अग्नि को।
धधक-धधक कर जलता देखो,
विषाद न छूता अवनी को॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा २
मर्म भरा रे कूट-कूटकर,
दर्प नहीं है उर में।
अंधेरों से अनुनय कैसा,
दृढ़ कर्मठता कर में॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा ३
कलरव की मधुरिम ध्वनि से,
गूँज उठे कुल घर-द्वारे।
उठो, चलो, नभ ओर निहारो,
सूरज से मिटते अधियारे॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा ४
भाग पड़े अँधेरे सारे,
दुबक गए कोनों में।
सदा निराला खुशी लिए,
चिड़िया चली दानों में॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतिम
खुद जलकर जग को रोशन,
करे निराला दिनकर।
देकर जीवन सबको जग में,
नहीं जताता कोई कर॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
-संजय निराला
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