आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निकल पड़ा हरकारा देखो

                
                                                         
                            हरकारा
                                                                 
                            
मुखड़ा
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को।
राग-द्वेष मन में ना कोई,
बने सहारा सबको॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा १
तन की अपनी गठरी लेकर,
किया हवाले अग्नि को।
धधक-धधक कर जलता देखो,
विषाद न छूता अवनी को॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा २
मर्म भरा रे कूट-कूटकर,
दर्प नहीं है उर में।
अंधेरों से अनुनय कैसा,
दृढ़ कर्मठता कर में॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा ३
कलरव की मधुरिम ध्वनि से,
गूँज उठे कुल घर-द्वारे।
उठो, चलो, नभ ओर निहारो,
सूरज से मिटते अधियारे॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतरा ४
भाग पड़े अँधेरे सारे,
दुबक गए कोनों में।
सदा निराला खुशी लिए,
चिड़िया चली दानों में॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
अंतिम
खुद जलकर जग को रोशन,
करे निराला दिनकर।
देकर जीवन सबको जग में,
नहीं जताता कोई कर॥
निकल पड़ा हरकारा देखो,
जलता-तपता खुद को॥
-संजय निराला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर