चश्मा और झुर्रियाँ
मुखड़ा
आँखों पर लगते चश्मे,
गालों पर उभरें झुर्रियाँ,
हौले-हौले कहतीं है रे
भाग नहीं, गिन रे निज कमियाँ।
अंतरा १
बालों में उतरी रे चांदी,
पग में थोड़ी थकन समाई,
बीता कल जब याद दिलाए,
कितनी राहें रे छूट गईं।
सपनों की जो गठरी बाँधी,
कुछ पूरी, कुछ खंडित साधी,
मन के कोने बैठी यादें,
चुपके-चुपके रे पूछ रहीं।
मुखड़ा
आँखों पर लगते चश्मे,
गालों पर उभरें झुर्रियाँ,
हौले-हौले कहतीं है रे
भाग नहीं, गिन रे निज कमियाँ।
अंतरा २
दोष न देना समय किसी को,
दोष न देना भाग्य किसी को,
जो बोया था वही उगा है,
जीवन की रे इस क्यारी में।
ठोकर भी शिक्षक बन जाती,
पीड़ा भी राह दिखा जाती,
अपने भीतर दीप जलाकर,
चलना रे अपनी बारी में।
अंतरा ३
कल की चिंता छोड़ मुसाफिर,
आज को स्वयं मान मुसाफिर,
शेष बची जो साँसें उनको,
व्यर्थ न यूँ ही रे जाने दे।
मन में मैल अगर कुछ बाकी,
धो ले उसको बनकर साकी,
अपने भीतर झाँक निराला,
खुद को स्वयं से जीतने दे।
समापन
आँखों पर चश्मा चाहे हो,
आनन पर सौ झुर्रियाँ हों,
जब तक भीतर चैतन्य ज्योति,
तब तक राहें रे दूर नहीं।
भाग्य नहीं बस कर्म सँवारो,
जीवन को फिर आज पुकारो
हौले-हौले कहतीं हैं रे,
निज कमियों से रे हार नहीं।
- संजय निराला
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