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प्यास बुझाया पी कर नीर ।।

                
                                                         
                            कौआ बैठा खंभे पर,
                                                                 
                            
करता काँव’-काँव,
खड़ी दुपहरी, तगड़ी धूप,
नहीं पेंड़ की छाँव ।

दूर-दूर तक सन्नाटा था,
नहीं दीखता कोई गाँव ।
सोच रहा इस रेगिस्तान में,
कहाँ रखे वह पाँव ।

तड़प रहा था कैसा प्यासा,
ढूंढ रहा अंजलि भर जल ।
सारे गड्ढे सूख चुके थे,
नहीं वहाँ पर कोई नल ।

उड़ पाने की हिम्मत न थी,
था वह अबोध लाचार ।
किया याद जगदीश्वर को
वह– ‘प्रभु लगाओ पार ।’

जन-जन को जो जीवन देता,
वह प्रभु बड़ा कारसाज ।
सहसा नभ से उतरा एक,
भारी-भरकम बाज ।।

दबा पाँव में कौवे को वह,
उड़ चला सरवर के तीर ।
छोड़ा, उसने राहत पाया,
प्यास बुझाया पी कर नीर ।।
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1 hour ago

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