लगता है अब नहीं रहूँगा
एक बार जो बात कही है,
बार-बार मैं वही कहूँगा।
सच्चाई का गला घोंटकर,
कैसे मैं भला यहाँ रहूँगा?
अरमानों की बलि-वेदी पर,
एक नहीं, सौ बार मरूँगा।
मिट जाए चाहे निशाँ भले ही,
पर पीछे पग नहीं करूँगा।
सच मानो प्रिय बंधु! मुझे—
लगता है अब नहीं रहूँगा।
झूठ यहाँ पर सिंहासन पर,
सच को सूली मिलती है।
ईमानदारी की राहों में,
हर पल ठोकर मिलती है।
चाटुकार दरबारों में हैं,
सच्चाई बेबस रहती है।
जिसके हाथों में है ताकत,
उसकी ही चलती रहती है।
कब तक अन्यायों के आगे,
अपना शीश झुकाता रहूँगा?
अपने ही अंतर्मन की आवाज,
कब तक दबाता रहूँगा?
सच मानो प्रिय बंधु! मुझे—
लगता है अब नहीं रहूँगा।
— संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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