चोंच में एक-एक तिनका लाकर,
रखती थी वह मोंके में ।
एक दिन सब कुछ उजड़ गया,
हवा के एक ही झोंके में ।।
फिर-फिर लाई चुनकर तिनका,
हिम्मत ना वह हारी ।
पूरा किया घोंसले को, तब–
वह चिड़ियां बेचारी ।।
मैं अक्सर देखा करता था,
छुप कर एक झरोखे से ।
पकड़ ना ले जा कोई एक दिन,
उस नन्हीं जी को धोखे से ।।
बीते कुछ दिन इस घटना को,
एक दिन चूँ-चूँ, चीं-चीं।
गूंज उठा कोलाहल घर में,
उन नन्हें बच्चों की ।।
रोज चुंगाती बच्चों को वह,
लाकर दाना मुख से ।
वे अबोध चिड़िया के बच्चे,
माँ संग रहते सुख से ।।
बच्चों मानों कभी न हार,
तुम भी अपने जीवन में ।
निश्चित सफल बनोगे तुम,
ठान लिया यदि मन में ।।
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