एक चींटी थी बहुत बीमार,
था कई दिनों से उसे बुखार,
बच्चे उसके थे कुल चार,
भूखे मरने को लाचार।
नन्हें बच्चे भूख से व्याकुल,
दिनभर करते थे कुलकुल,
भूख वेदना देख सकी ना,
निकली बिल से, चलती हिलडुल ।
सोच रही थी अपने मन में,
मिल जाएगा कुछ तो वन में,
आ जाएगी हिम्मत थोड़ी,
खा करके बच्चों के तन में।
इसी सोच में खोई-खोई,
मन में एक उम्मीद संजोई,
होता जग में वही घटित है,
नियति द्वारा जो पूर्व रचित है।
गौरैया एक नभ से उतरी,
दबा चोंच में उसको कुतरी,
गई घोंसले में अपने वह,
चीं- चीं करते बच्चे जंह।
खुला चोंच बच्चे का, उसमें–
गौरैया ने डाला चींटी ।
खा करके चींटी को बच्चा,
करने लगा पुनः चीं - चीं।
उधर सोचते बच्चे उसके,
माँ उनकी आएगी कब,
खाकर उनकी भूख मिटेगी,
माँ दाना लाएगी जब ।
खाएंगे मिल मम्मी संग हम,
मम्मी हमें खिलाएगी,
मुँह में लाकर जल अपने,
मम्मी हमें पिलाएगी।
खिला हमें दाना–पानी जब,
मम्मी हमें सुलायेगी,
कोई प्यारी सी नई कहानी,
फिर से हमें सुनाएगी।
तभी एक शिशु ने आकर,
कर दी उनके बिल पर सू-सू,
डूबे जल में तड़प मरे वे,
हुआ न कोई मैं-मैं, तूँ-तूँ ।
अपने में यहाँ सभी मगन हैं,
औरों की चिंता किसको,
कोई ऐसा नहीं यहाँ,
कह सको अपना जिसको ।।
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