खुद में ही खुद का वजूद ढूँढता हूँ
क्या सच में बदल गया हूँ सबूत ढूंढता हूँ
क्या था मैं क्या हो गया सब बीती बातें हैं
खुद के लिये दो पल का सुकून ढूंढता हूँ
क्या खोया क्या है पाया ये गम नहीं है लेकिन
हर लम्हा खुश रहने का जुनून ढूँढता हूँ।
-संदीप
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X