हिन्दी अनुभूति अभिव्यक्ति की बहार है
हिन्दी बिंदी है होंठलाली है शृंगार है
हिन्दी ममता है प्रेम की बहती धार है
हिन्दी आनंद की अविजित संसार है
हिन्दी जैसी दिखे वैसा ही कहती है
हिन्दी रंग बदल कर नहीं बहती है
हिन्दी व्यक्तित्व संदीप्त कर देती है
हिन्दी सद्भावना उद्दीप्त कर देती है
हिन्दी मस्त कर देती है डूबकर देखो
हिन्दी चूमोगे सबसे ऊबकर देखो
-कुँवर संदीप सिंह
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