शायद मुझे देखेंगी पलट कर तेरी आँखें,
इसी इंतज़ार में हम आज भी ठहरे हुए हैं।
तेरे जाने के बाद भी ये दिल मानता नहीं,
अधूरे ख़्वाब अब भी तेरे नाम से जुड़े हुए हैं।
हर रात चाँद बन के उतरती है तेरी याद,
और हम अँधेरों में तन्हा से पड़े हुए हैं।
कभी सोचा न था यूँ बिखर जाएँगे हम भी,
तेरी मोहब्बत में कितने अरमान जले हुए हैं।
लोग पूछते हैं वजह मेरी खामोशी की अब,
कैसे बताएं ज़ख्म कितने दिल में छुपे हुए हैं।
एक तू था जिसे हमने खुदा मान लिया था,
अब उसी के फ़ैसले से हम टूटे हुए हैं।
शायद किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात हो जाए,
इसी उम्मीद में रास्ते अब भी सजे हुए हैं।
~संदीप पाण्डेय
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