एहसान करोगे क्या मुझ पर तुम खुद भी तो मुरझाए हो।।
आईना देख के उदास हो क्यूँ ये वक़्त तुम ही तो लाए हो।।
आंखों को भिगो कर पानी से क्या बज़्म सजाए फिरते हो,,
क्यूँ करते हो अब दिल छोटा ये आग तुम ही तो लगाए हो।।
जिसकी क़िस्मत में जो लिखा मिलना तो उसे उतना ही हैं,,
हर कोई यहाँ ग़म का मारा ये बात तुम ही तो बताए हो।।
हर वक़्त नज़र हैं ऊपर को वहां कोई तुम्हारा रहता क्या,,
ख़्वाबों को सज़ा कर मुट्ठी में ये रेत तुम ही तो उड़ाए हो।।
बेहतर तो यही के दुनियाँ से दिल ना ही लगे तो अच्छा है,,
हर कोई यहाँ अपने में गुम ये राज़ तुम ही तो समझाए हो।।
कहाँँ किसे है फ़ुर्सत इतनी के अच्छे से मर भी जाए यहाँ,,
जैसा भी मिला है जी लो बस यहाँ ग़म ही तो हमसाए है।।
इन आंखों से दरिया न बहा सबके हिस्से कुछ ना कुछ देव,,
कहीं बिकते नहीं देखें आँसू ये खरीद तुम ही तो लाए हो।।
- सुनील देव
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