फांसिले भी फांसिलों से फांसिलों में आ गए।।
हम तन्हाई से निकल कर काफ़िलो में आ गए।।
जो कभी रहते थे अपने घर गाँव में बरगद तले,,
आज वो पंछी भी सारे सब घोंसलों में आ गए।।
याद करती रह गई बस गाँव की गलियाँ सभी,,
कच्ची राहें छोड़ कर दिल दिलजलों में आ गए।।
मिट्टी में खेले बड़े जो हमेशा कुश्तियों के शेर थे,
गाँव से वो भी निकलकर बुज़दिलों में आ गए।।
कितना अच्छा वक़्त था सब रहते थे साथ जब,,
फूलों को छोड़ कर आज संगदिलों में आ गए।।
इक छत के नीचे कट रही अब कोई ना देखता,,
क्या सोचकर के छोड़ा गाँव जाहिलों में आ गए।।
चल तो रही घड़ियाँ मगर वक़्त रुक गया है देव,,
कुछ तो ख़ता हुई जो इन तंगदिलों में आ गए।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X