सुना है रोज़ उठकर घर से वो मेमार जाता है।।
मशक्कत रोज़ करता है मगर वो हार जाता है।।
हर माह सोचता है के कुछ अपने लिए भी लूँ,,
मगर हर बार अपनी जेब से वो हार जाता हैं।।
जिसे भी देखता है वो खड़ा है ग़म के दरिया में ,,
ना वो उस पार जाता है ना इस पार आता है।।
खड़ा मझधार में हर शख़्स यही सोचता होगा,,
अब क्यूँ नहीं बचपन का वो इतवार आता है।।
जरा सी बात पे ही रूठकर के मुँह फूला लेना,,
याद भाई से वो लड़ना झगड़ना यार आता है।।
था जब हाथ सर पे बाप का कुछ कमी ना थी,,
हटा जब से वो साया खुद को लाचार पाता है।।
अभी माँ साथ है अपनी तो घर में रौनकें है देव,,
ग़लत जब सोचता है कुछ तो बेज़ार पाता है।।
-सुनील देव
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