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कुछ दुनियाँ हम जैसी भी।।

                
                                                         
                            कुछ दुनियाँ तुम जैसी होती कुछ दुनियाँ हम जैसी भी।।
                                                                 
                            
कुछ ग़म लगते हमसाये से कुछ खुशियाँ ग़म जैसी भी।।
आँख में पानी अच्छा लेकिन आग बुझे ना प्यास बुझे,,
कुछ सागर तुम जैसे होते कुछ नदियाँ हम जैसी भी।।
कितना अच्छा लगता हैं जब प्यार के दिन हो नए नए,,
कुछ मौसम तुम जैसे लगते कुछ सदियाँ हम जैसी भी।।
उल्फ़त की हल्की दुनियाँ भी कितनी प्यारी लगती हैं,,
कुछ राहें तुम जैसी लगती कुछ गलियां हम जैसी भी।।
कुछ भी कह लो तुम यार मगर सब लगता है बेगाना सा,,
कुछ तुम लगते फूलों जैसे कुछ बगियां हम जैसी भी।।
यादों ने साथ निभाया मेरा शाम ढले या दिन निकले,,
ख़्वाबों में रहे हम तुम जैसे कुछ रतियाँ हम जैसी भी।।
इन रात के ठंडे सायों में पल पल का मरना रहता देव,,
बस मोम जले हैं तुम जैसे कुछ बतियाँ हम जैसी भी।।
-सुनील देव
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58 मिनट पहले

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