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कोई समंदर नहीं रहा।

                
                                                         
                            पत्थर जो था कभी वो पत्थर नहीं रहा।।
                                                                 
                            
आंखों के सामने कोई समंदर नहीं रहा।।
क्या देखते हो बारहा कुछ भी तो नहीं है,,
पीछे तेरे अब कोई सितमगर नहीं रहा।।
हर बात पर ना जेब से सिक्का उछाल तू ,,
क़िस्मत के आगे कोई सिकंदर नहीं रहा।।
तस्वीरें उसकी देखकर ना तू मलाल कर,,
बादल वफ़ा का कोई उम्र भर नहीं रहा।।
हर कोई चल रहा था मेरे साथ साथ पर,,
क़ज़ा क़रीब आयी तो कोई सर नहीं रहा।।
इक बोझ सर लिए बदन चलता रहा मेरा,,
नींदों में भी साथ कोई बिस्तर नहीं रहा।।
आवाज़ें ही आती रही बस उसकी ताउम्र,,
मेरी गली का चाँद कोई छत पर नहीं रहा।।
अच्छा हुआ जो सो गया कफ़न ओढ़कर,,
जलने के बाद अब कोई नश्तर नहीं रहा।।
अब याद करने से भी क्या फ़ायदा है देव,,
वो भी अपने साथ कोई कमतर नहीं रहा।।
-सुनील देव
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एक दिन पहले

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