आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोई मुझको समझाए अब

                
                                                         
                            याद करूँ या शब भर रोऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
                                                                 
                            
राह देखूँ या फिर घर जाऊं कोई मुझको समझाए अब।।
वो तो कब का चला गया है रहता था जो दिल के अंदर,,
कैसे अब इसको समझाऊँ कोई मुझको समझाए अब।।
कितना आसाँ होता हैं यां दिल का क़त्ल दिलों के हाथ,,
दिल को छोड़ूं या मर जाऊँ कोई मुझको समझाए अब।।
जब चेहरे में छुपा हो चेहरा कितना मुश्किल है बचना,,
आईना इक घर से ले आऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
वो तो रह गया मीलों पीछे और आगे लगता हैं शमशान,,
शाम हुई है क्या रुक जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
दिल की गली में क्या जाना अब मातम सा इक रहता है,,
हवा बनूँ या गर्क़ हो जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
उसको तो मालूम नहीं के क्या क्या गुज़री मुझपे देव,,
दफ़्न रहूँ या मिलने जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।

- सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर