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कुछ रोज़ की बची है तो क्या तमाशा करें देव

                
                                                         
                            मुझको अपने शहर का कोई मेयार जानिए।।
                                                                 
                            
पोशीदा ही सही मगर ना कोई दयार जानिए।।

तबीयत ख़राब रहती हैं अपनी भी आजकल,,
दुरुस्त नहीं तो ना सही कोई बीमार जानिए।।

चल ये भी तेरी मान ली के वक़्त नहीं मिलता,,
मुझको भी बेवज़ह सही कोई तैयार जानिए।।

गुस्ताखियां करना तेरी फ़ितरत में है शामिल,,
क़िस्मत से ही सही मगर कोई यार जानिए।।

दावा तो उस पे ठीक हैं जो मिलना ही नहीं है,,
गुज़रा हुआ ही सही मगर कोई प्यार जानिए।।

दिलों से दिल मिले नहीं ज़िस्मों से ज़िस्म भी,,
जाती हुई ऋतु को ही अब कोई बयार जानिए।।

कुछ रोज़ की बची है तो क्या तमाशा करें देव,,
जो हुआ अच्छा हुआ कोई जाँ निसार जानिए।।
-सुनील देव
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एक घंटा पहले

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