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ज़िंदगी का क्या हैं अब

                
                                                         
                            साँस चालनी चाहिए ज़िंदगी का क्या हैं अब।।
                                                                 
                            
कह लो जो कहना है सादगी का क्या हैं अब।।

हम तो कब के आ चुक हैं छूके अपनी मौत को,,
ले चलो फिर से वहीं दरिंदगी का क्या हैं अब।।

अच्छी कब की जी चुके हैं जो बची हैं दर्द की,
जो भी करना है करो पसंदगी का क्या हैं अब।।

कोई मोड़ लौटके ख़ुशी से आया ना मेरी तरफ,,
जब ख़ुदा ही नहीं तो बन्दगी का क्या हैं अब।।

काम तो कुछ भी नहीं है वक़्त काटे किस तरह,,
मंज़िले ही खो गई तो परिंदगी का क्या हैं अब।।

अपने घर में आज हम भी गोया पराए हो गए,,
आँख सबकी लाल है गज़ंदगी का क्या हैं अब।।

नाम भी अब क्या करे देव काम के भी तो नहीं,,
मुझको भी दे दे ज़हर तिश्नगी का क्या हैं अब।।
-सुनील देव
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2 घंटे पहले

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