आंखों में हैं पानी भरा और दिल हुआ उदास।।
कहने को हम थे साथ पर रहते कहाँ थे पास।।
जाने क्यूँ हम मिले थे और फिर क्यूँ जुदा हुए,,
ऐसे हज़ारों सवालों हैं पर मिलते नहीं ज़वाब।।
आवारगी के नाम पर सब कुछ छोड़ आए हम,,
रह गई ज़हन में तिश्नगी दरिया के रहते साथ।।
अच्छा हुआ के रोशनी को घर ही जला लिया,,
वरना तो इन अंधेरों में खो जाते हम भी आज।।
तेरे बदन की खुशबू जो कभी महसूस थे किए,,
आती नहीं है बू भी वो चाहे कैसे खिले गुलाब।।
मुझको अब मेरे हाल पर तू छोड़ दे ए ज़िंदगी,,
क्या होगा तेरे रोने से भी थम गई है मेरी साँस।।
.
रहता धड़कता दिल जो तो कर देता फ़नाह देव,,
अच्छा हुआ के जल गया ये जिस्म के ही साथ।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X