कुछ ना सही तो इतनाके पलकों पे ही बिठा लेना।
तू दिल से जुदा करना या फिर हिस्सा बना लेना।।
मैं कहां माँगता हूं अब तेरे इन ज़ख्मों का हिसाब,,
जो तू चाहे वो करना बिछड़ जाना या बुला लेना।
मेरे हिस्से में ग़म ए जुदाई है तो आकर ही रहेगी,,
मेरी ना सुनना कुछ भी तू अपने मन की चला लेना
कोई नहीं आए है लौटके इस दुनियाँ में वापस फ़िर
ख़ाक़ डालके मुझपे तू इक दुनियाँ नई बसा लेना।
क्या सोचेगी दुनियाँ भी ये पलटी गर जो देख मुझे,
गलती से मुड़ जाए तो बस अपनी नज़र हटा लेना
गहरे किसी समंदर में मैं डूब के भी गर मर जाऊँ,
कोई ख़्वाब समझ के मुझको दिल से ही भुला देना
क्या लिखा है क़िस्मत में किसको ये मालूम है देव
जब तक चल रही हैं साँस तब तक ही चला लेना।
-सुनील देव
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