सच तो ये है कि उसको जो ,
जरूरी लगा उसने वो किया,,
उसको घर पसंद था,
उसने घर बनाया,,
उसको शादी पसंद थी,
उसने शादी बनाई,,
उसको पसंद था घूमना,
जेवर खरीदना,
कपड़े इकट्ठा करना,
निजी रिश्ते निभाना,
उन रिश्तों को संभालना,
उनके लिए जगना,
दवा खिलाना,
उनकी भूख को
समझना,
उनके लिए खाना
बनाना,,
उनको कपड़े खरीदना,
उन कपड़ों को
स्त्री करना,,
उनसे जुड़ी छोटी से छोटी
हर जिम्मेदारी पूरी करना,,
उसने वो सब बखूबी
निभाया,
उनके थोड़े से बुखार पर
खुद को सारी रात जगाया,,
इस तरह से उसने ,
वो सबकुछ किया,
जो उसका अपना काम था,,
और एक दिन उसे लगा
कि प्रेम तो उसने,
किया ही नहीं,,,
तो फिर उसको,
किसी से प्रेम भी हो गया,
बहुत गहरा वाला ,,
उसे उम्मीद थी कि,
उसका प्रेमी उसके रोने पर,
रोयेगा,
वो सो जाएगी,
तभी सोयेगा,,
व्रत रहने पर,
नहीं खायेगा,
दुःखी हुई तो,
सिरहाने पे घुटने टेके
पड़ा रहेगा,
कहीं नहीं जाएगा,,
सब मिलाकर,
उसका अपना कुछ न होगा,
होगा कुछ तो
बस अटूट समर्पण,
अपनी इच्छाओं का अर्पण,,
सबकुछ उसे चाहिए था,
अपनी शर्तों पर,
इन सारी चीजों में
वो एक चीज भूल गई,
प्रेम करना,
भूल गई वो प्रेम के
लिए जीना,
प्रेम चाहिए था उसको,
तो उसने खुद को प्रेम दिया,
मगर प्रेम के लिए
वो , वह नहीं कर पाई,
जो प्रेम में जरूरी था,
उसने प्रेम ,प्रेम के लिए
नहीं किया,
अपने प्रेम को,
वैसा कुछ भी नहीं दिया,
जिसकी जरूरत उसके
प्रेम को थी,
प्रेम की इच्छाओं को
कभी महसूस ही ,
नहीं कर पाई हो,
क्यों कि उसका प्रेम
जीवनोपयोगी नही था,
उसके प्रेम में बाध्यता नहीं थी,
उसके प्रेम में इतनी ताकत न थी,
जो निभाने के लिए
मजबूर करती,,
क्यों कि उसे प्रेम पसंद नहीं था,
इसीलिए उसे जो 2
पसंद था उसने वो 2
किया,
उसे प्रेम इतना पसंद नहीं था,
कि वो प्रेम को जिये,
और बन जाए वो नीलकंठ,
प्रेमी के हिस्से का
विष पिये।।
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