आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कर डालो

                
                                                         
                            कहीं निराशा की धुंधली बदली
                                                                 
                            
‎आनन्द सस्मित में खलल करे
‎तो उसे बरसा डालो।
‎कहीं जीवन के घने कानन में
‎कलरव करती चिड़िया दूर होने लगे
‎तो उसे खुद में बसा डालो।

‎क्रोध - अग्नि के भीषण ताप से
‎मन में ठहराव के पुल जलने लगे
‎तो उसे जमा डालो।
मन के सुन्दर बाग़ में
‎सुगन्धित कुमलाये पुष्प मिले 
‎तो उसे खुद में समा डालो।

‎कहीं आलस्य की घनी काई में
‎जीवन के पैर फिसल जाने लगे
‎तो उसे हटा डालो।
‎कही संशय की धुंध में
‎खुद से मिलना मुश्किल लगे
‎तो उसे खुद से मिटा डालो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर