कहीं निराशा की धुंधली बदली
आनन्द सस्मित में खलल करे
तो उसे बरसा डालो।
कहीं जीवन के घने कानन में
कलरव करती चिड़िया दूर होने लगे
तो उसे खुद में बसा डालो।
क्रोध - अग्नि के भीषण ताप से
मन में ठहराव के पुल जलने लगे
तो उसे जमा डालो।
मन के सुन्दर बाग़ में
सुगन्धित कुमलाये पुष्प मिले
तो उसे खुद में समा डालो।
कहीं आलस्य की घनी काई में
जीवन के पैर फिसल जाने लगे
तो उसे हटा डालो।
कही संशय की धुंध में
खुद से मिलना मुश्किल लगे
तो उसे खुद से मिटा डालो।
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