सोई थी काम्यक-भूमि निशा की शीतल गोद समेट,
पर उर में प्रतिकाराग्नि थी धधक रही अविरत चेत।
तप के तेरह वर्ष झुके थे पूर्णाहुति के द्वार,
किन्तु नियति लिख रही अभी भी शेष अग्नि-अवतार।
वायुपुत्र की नस-नस में रण का वेग उफनता था,
जैसे बंधा हुआ समुद्र तट तोड़ निकल पड़ता था।
दूर शिला पर धनंजय बैठे मौन दिशाएँ गिनते,
जैसे आने वाले समर की ध्वनियाँ पहले से सुनते।
नकुल निहारें नभ के संकेत, सहदेव समय के भेद,
दोनों खोज रहे थे मानो भविष्य के गुप्त संदेश।
तभी तिमिर की तहों चीरता एक तपस्वी आया,
नेत्रों में ध्रुव-ज्योति लिए, मुख पर काल समाया।
नेत्रों में गंभीर ज्योति, मुख पर अद्भुत तेज,
मानो स्वयं काल ने धारण किया हो ऋषि-वेश।
“धर्मपुत्र!” वह बोला गंभीर मेघनाद स्वर में,
“अज्ञातवास समीप खड़ा है विधि के कठिन द्वार पर।
विजय वही पाएगा जो अपने को जीत सके,
जो अपमानों के विष को पीकर भी धैर्य धरे।”
युधिष्ठिर ने शीश झुकाया—
“ऋषिवर! पथ बतलाइए।
कैसे छिपेगा सूर्य स्वयं जब शत्रु दिशाओं में छाए?”
“विराट-नगर ही अब तुम सबकी शरण बनेगा।
किन्तु वहाँ तुम्हारा प्रत्येक दिवस अग्नि समान जलेगा।
राजा होकर दास बनोगे, वीर होकर सेवक,
और समय के वक्षस्थल पर रखना होगा संयम।”
यह सुनकर भीम दहाड़ उठे—
“कैसे सहूँ अपमान?
कैसे झुकाऊँ यह मस्तक दुर्योधन के कारण?”
अर्जुन ने तब शांत स्वर में भीमसेन को देखा,
“भैया! कभी-कभी धैर्य ही रण का प्रथम लेखा।
जिस दिन पुनः गाण्डीव उठेगा रण के मैदानों में,
उस दिन काँपेगा हस्तिनापुर अपने प्राचीरों में।”
रात्रि गहराती जाती थी।
वन में वायु विलाप करे।
दूर कहीं उल्लू की ध्वनि अशुभ संकेत भरे।
द्रौपदी ने नभ की ओर देखा अश्रु भरे नयनों से—
“हे माधव! कब अंत होगा इन अन्याय क्षणों से?”
तभी अचानक मेघों के भीतर विद्युत् चमक उठी,
मानो स्वयं द्वारिका से कोई अदृश्य हँसी फूटी।
एक शीतल समीर बहा वन के सूखे पत्तों पर,
और लगा— कहीं कान्हा मुस्काते हों अंबर पर।
प्रभात हुआ।
वन ने अंतिम बार पांडवों को देखा।
वृक्षों ने झुककर मानो अपना आशीष लेखा।
गाण्डीव बाँधा गया वस्त्रों में।
भीम ने गदा छिपाई।
राजमुकुटों के स्थान आज साधारणता आई।
राजमुकुट की प्रभा बुझी थी समय-विधाता के आगे,
कंक बने धर्मराज आज थे भाग्य-विपर्यय के भागे।
भीम छिपाए वज्रभुजाएँ रसोई की ज्वाला में,
अर्जुन बृहन्नला बन बैठे वीरत्व की माला में।
नकुल अश्वशाला की ओर,
सहदेव गौओं के संग।
द्रौपदी सैरंध्री बन चली लिए हृदय में ज्वाल-अनंग।
इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ के स्वामी चल पड़े झुककर,
किन्तु उनके चरणों के नीचे काँप रहा था भूधर।
क्योंकि समय छिपा सकता है केवल मानव का रूप,
पर वीरों की नियति नहीं रहती अधिक काल अनूप।
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