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शरद पूनम का चांद

                
                                                         
                            किसी रोज, किसी कविता को पढ़
                                                                 
                            
खिड़की खोल लेती हूं
वो मुझे देख मुस्काएगा ,
शरद पूर्णिमा का चांद कभी
मेरी खिड़की पर भी आएगा ।

था रात का तीसरा पहर
ओस से जब वृक्षों की पत्तियां
जाती सिहर
किसी डरावने सपने से नींद खुली
मैं तब चांद से मिली ।

मैंने प्रश्न किया
" इतना इधर - उधर क्यों करते हो
नींद नहीं आती, सोते क्यों नहीं
किसके ख़यालो में
जगते ही मरते हो ? "

सुनो! क्या कहता है
मेरे शहर का चांद
उसकी एक नहीं,
असंख्य हैं प्रेमिकाएं
असमंजस में है कि
कौन सी व्यथा - कथा मुझसे बताए ?

वो खुली खिड़कियों से
बंद कमरों में झांक
असलियत को पढ़ , उसे सहता
कभी कुछ न कहता प्रश्न में ,
उत्तर में केवल चुप हैं रहता ।

उसके मौन रहने और
मेरे तकने का क्रम चलता ही रहा
बात हुई नहीं हमारी
उसने ये तक नहीं पूछा
" नींद कहां हैं तुम्हारी ? "

तकिये से लगे डायरी पर
लेखनी चला
एक पन्ना मोड़ लेती हूं
चांद से रूठ , करवट बदल
चादर फिर से ओढ़ लेती हूं ।

- Saloni Pandey


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6 वर्ष पहले

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