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ढहना मन का

                
                                                         
                            अकस्मात् क्या हुआ धरा पर
                                                                 
                            
फैला चारों ओर अँधेरा

बड़े वेग से मेघों ने भी
नभ का कोना-कोना घेरा

चाँद छुपा, तारे भी ओझल
लगा रहे बस जुगनू फेरा

रोक साँस थम गया समीरण
पग-पग सन्नाटे का डेरा

विद्युल्लेखा रच कर भागा
सहसा कोई निपुण चितेरा

मानों गुप्त करों से उसने
जग पर हीरक-पुंज बिखेरा

तड़-तड़ करके बूँदें बरसीं
तो दुबका बनपाखी टेरा

छप से नदिया का कगार ज्यों
ढहा, ढहा पागल मन मेरा
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23 घंटे पहले

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