अकस्मात् क्या हुआ धरा पर
फैला चारों ओर अँधेरा
बड़े वेग से मेघों ने भी
नभ का कोना-कोना घेरा
चाँद छुपा, तारे भी ओझल
लगा रहे बस जुगनू फेरा
रोक साँस थम गया समीरण
पग-पग सन्नाटे का डेरा
विद्युल्लेखा रच कर भागा
सहसा कोई निपुण चितेरा
मानों गुप्त करों से उसने
जग पर हीरक-पुंज बिखेरा
तड़-तड़ करके बूँदें बरसीं
तो दुबका बनपाखी टेरा
छप से नदिया का कगार ज्यों
ढहा, ढहा पागल मन मेरा
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