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बचपन कितना अनमोल था

                
                                                         
                            बचपन में इधर-उधर रेंगना,
                                                                 
                            
कुर्सी पकड़ कर चलने की कोशिश करना,
और छोटी सी चोट लगे,
तो सारा घर सिर पर उठाना।

उस वक़्त खुशी का ही माहोल था,
बचपन कितना अनमोल था।

थोड़े बड़े होने के बाद,
बस्ता पकड कर स्कूल जाना,
अपने उमर के लोगो के साथ पढना-लिखना,
पढाई के वक़्त पढना, और खेलने-कूदने के समय,
दिल खोल कर खेलना।

तब पढाई कभी बोज नही था,
बचपन कितना अनमोल था।

सुबह स्कूल न जाने की ज़िद करना,
पर स्कूल पहुँचने के बाद दोस्तो के साथ घुल-मिलना,
चौथे पिरियड में रीसेस का इंतज़ार करना,
छुट्टी के बाद सीधा घर जाना,
और शाम होते ही खेलने के लिए भागना।

तब किसी के पास मोबाइल नही था,
बचपन कितना अनमोल था।

वह बचपन का माहोल अब खो सा गया,
अब तो सब के पास मोबाइल आ गया,
सूने है वह झूले, जिस पर बच्चे झूला करते थे,
अकेले पड़ गए हैं वह बगीचे के फूल,
जिस के बीच बच्चे खेला-कूदा करते थे।

अब धरती का वातावर्ण बदल सा गया,
पता नही वह बचपन कहा गया?

- सौम्य साई धनुष
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4 घंटे पहले

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