शक्ति की साधना का, पावन पर्व दशहरा।
नारी के सम्मान का, गौरव पर्व दशहरा।
मिट्टी की मूरत में, माँ का रूप सजाए।
लौंग, कपूर, बताशा, माँ को भोग लगाए।
सप्तमी, अष्टमी, नवमी, कन्या पूजन की तैयारी।
हलवा, पूरी, चना और चुनरी लाल प्यारी।
नौ दिन शक्ति की, अराधना और उपवास।
कुमकुम, चंदन, फूल, धूप की सुगंध और विश्वास।
सोने की लंका जली, अहंकार का मिटा मान।
एक सीता के सम्मान में, दश शीश का लुटा अभिमान।
बुराई कितनी भी बड़ी हो, अच्छाई से हारी।
विजयादशमी सिखाती, यही सीख हमारी।
रावण दहन की ज्वाला, और मेले की सज्जा प्यारे।
झूले-चकरी संग हंसती, बच्चों की बहारें।
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