सद्गुण सेवा से बढ़ें, त्वचा निखारें लोग।
लोक हाथ परलोक है, सधें सार्थक योग।।
उबटन साबुन के मले, बिखरे चमक तिखार।
बुझे शकल मन के दुखे, ख़ुशियॉं लेंय निखार।।
बीते बचपन खेल में, जोबन रूप निखार।
जरा रोग सब लोक के, हरि परलोक अधार।।
आलस से जो हारते, चूकें अबुध अधार।
कर्म नित्य अभ्यास से, पाते नया निखार।।
चक्कर अच्छा है नहीं, बरन स्याम पिक काग।
गुण के निखरे पारखी, परखें गुण बेदाग।।
तुष्टि नीति फतवा लगे, वोट प्रसूता नार।
गद्दारों को मौज में, मिलता खूब निखार।।
- शिव नारायण सक्सेना 'शौक',
अयोध्या.
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