अपने भीतर झाँक जरा तू!!
अपने भीतर झाँक जरा तू, खुद को भी तो आँक जरा तू।
जुबाँ कभी ना फिसले तेरी,अब टूटे मन भी टाँक जरा तू।।
खामोशी भी शोर मचाती, गर जानो ऐतराज जताती।
अपनी-अपनी खूबी सबकी, बस अपनी न हाँक जरा तू।।
मौन की सुई मुस्कान के धागे, होने न पाए दूर कभी।
नव सृजन का स्त्रोत सदा ये, गौण नही है मौन कभी।
दूर रखें लफ़्ज़ों की कैंची, दरकन हो जाये जब कभी।
रिश्ते तो अनमोल है प्यारे, व्यर्थ न होगी टाँक
जरा तू।।
शब्दों से ही मिलती खुशियाँ, शब्दों से ही गम मिलता।
शब्दों से ही मिलती है पीड़ा, शब्दों से ही मरहम मिलता।।
शब्दों से ही वेद भी निःसृत, शब्द ब्रम्ह सरगम मिलता।
सर्जन और संहार जिनसे,शब्द को कम न आँक जरा तू।।
औरों से बड़ा बनने की दौड़, सदा थकाती है मन को।
खुद को बड़ा बनाने की साधना, शांति देती है मन को।।
जीना उसका ही भला जो, खुशी दे पाये जन-जन को।
भरी हुई है खूबी तुझमें, खुद को न कमतर आँक जरा तू।।
इच्छा ही है जो हम सबको, कभी चैन से न जीने देता।
खुद भले मर जाता आदमी, कभी इच्छा न मरने देता।।
यह अंतहीन इच्छा ही अक्सर, कभी धैर्य न रहने देता।
देख रहा तू बाहर -बाहर, खुद के भीतर भी झाँक जरा तू।।
-रोशन साहू 'मोखला'
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