डूसू इलेक्शन की दो डालियाँ,
जिस पे विद्यार्थी चढ़ते है।
चढ़ चढ़ के जब ऊब जाते,
दूजी को फिर चुनते है।
दोनों डालियाँ मुस्कुराकर,
मूर्ख बनाती है हर साल।
नया साल जब भी आता है,
नई ललक से फिर चमकाता ।
देकर नई आश का तमका,
बीते साल को फिर से छुपाता ।
अब तुम ही बतलाओ विद्यार्थी,
तुम आखिरकार एक दास हो।
कभी चढ़ते हो इस डाल पर,
कभी चढ़ते हो उस डाल पर।
कल्याणकारी डाल पर,
तुम कभी भी चढ़ नहीं पाएं हो।
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