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ज़िंदगी की जंग में

                
                                                         
                            ख़त में अपने लहू का इक समंदर ठीक है,
                                                                 
                            
ज़िंदगी की जंग में ज़ख़्मी मुक़द्दर ठीक है।

जो झुका दे सर हमारा वक़्त के आगे कभी,
उस हथेली से तो हाथों में ये ख़ंजर ठीक है।

तुम सँभालो हौसलों को तुम सफ़र जारी रखो,
मंज़िलों की राह में अब एक रहबर ठीक है।

धूप में जलते रहे पर हम कभी पिघले नहीं,
काग़ज़ी इस शहर में अपना ही ये घर ठीक है।

शायरी के इस सफ़र में सच ही लिखना तुम सदा,
सोच का ऊँचा हमेशा 'नादिर' अब सर ठीक है।
- रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर' 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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