बिछी हुई है शकुनि-चौपड़, दाँव पर लगा हर इंसान,
मौन खड़ी है कुरुसभा अब, बने हुए यहाँ सब पाषाण।
दुःशासनों के इस पहरे में, न्याय सिसकता है हर रोज़,
कातर आँखें ढूँढ़ रही हैं, कहाँ छुपा है गांडीव-ओज॥
मुख पर पट्टी बाँधे कोई, सहता शासन का आघात,
पीड़ा की इस काली रुत में, रोती नीलम जैसी रात।
रक्षक की ही छाया में जब, होने लगती काल-बरात,
तब तो केवल शेष यहाँ है, अंधकार की क्रूर बिसात॥
सिंहासन सब बहरे बैठे, अंधा राजा, अंधा तंत्र,
भूल गए जो जनसेवा का, सदियों पुराना पावन मंत्र।
काग़ज़ की वेदी पर जलती, जब निर्दोषों की ही आस,
टूटेगा तब मौन सभी का, फैलेगा फिर महा-प्रकाश॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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