आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वैभव का मिथ्या तमाशा

                
                                                         
                            सोने के चश्मों से देखो, जग का रंग बदलता है,
                                                                 
                            
मखमली मेजों पर वैभव का, नया तमाशा चलता है।अमीर की हर इक प्यास यहाँ पर, स्वाद का पिज्जा बनती है,
पर उस स्वाद की भट्टी में, बस गरीब का खून उबलता है।

चाँदी के बर्तनों में सजती, महलों की भूख-प्यास जहाँ,
इंसाफ की मदिरा ढलती है, बनकर ऊँचा रसूख यहाँ।ग़रीब की नस-नस निचोड़कर, बनती अट्टालिकाएँ हैं,
शोषक के होठों की लाली, शोषित का ही दुःख-सूख यहाँ।

यह कैसा मधुघट इस जग का, कैसा यह खेल निराला है
,जहाँ भूखे बच्चे की रोदन ही, अमीर का मधुशाला है।तरल स्वेद को रक्त बनाकर, जो मदिरा खींची जाती है,
उसी घूँट को पीकर हँसता, महलों का रहने वाला है।

तुम अपनी ताकत को समझो, मत समझो खुद को बेसहारा,
तुम्हारे ही श्रम के बल पर, चलता है यह जग सारा।
जिस दिन यह आँसू अंगारा बन, महलों की ओर बहेगा तब,ढह जाएगा यह झूठा जग, टूटेगा यह तख़्त तुम्हारा.।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर