सोने के चश्मों से देखो, जग का रंग बदलता है,
मखमली मेजों पर वैभव का, नया तमाशा चलता है।अमीर की हर इक प्यास यहाँ पर, स्वाद का पिज्जा बनती है,
पर उस स्वाद की भट्टी में, बस गरीब का खून उबलता है।
चाँदी के बर्तनों में सजती, महलों की भूख-प्यास जहाँ,
इंसाफ की मदिरा ढलती है, बनकर ऊँचा रसूख यहाँ।ग़रीब की नस-नस निचोड़कर, बनती अट्टालिकाएँ हैं,
शोषक के होठों की लाली, शोषित का ही दुःख-सूख यहाँ।
यह कैसा मधुघट इस जग का, कैसा यह खेल निराला है
,जहाँ भूखे बच्चे की रोदन ही, अमीर का मधुशाला है।तरल स्वेद को रक्त बनाकर, जो मदिरा खींची जाती है,
उसी घूँट को पीकर हँसता, महलों का रहने वाला है।
तुम अपनी ताकत को समझो, मत समझो खुद को बेसहारा,
तुम्हारे ही श्रम के बल पर, चलता है यह जग सारा।
जिस दिन यह आँसू अंगारा बन, महलों की ओर बहेगा तब,ढह जाएगा यह झूठा जग, टूटेगा यह तख़्त तुम्हारा.।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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