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ठहरो ज़रा, खुद से मिलो

                
                                                         
                            भागती इस दौड़ में, तुम कहाँ जा रहे हो?
                                                                 
                            
मृगतृष्णा के पीछे, क्यूँ अपना चैन गँवा रहे हो?
जो छूट गया पीछे, उसे मुड़कर मत देखो,
जो आज तुम्हारे पास है, उसे जीकर तो देखो।

सफलता की सीढ़ियों पर, पाँव भले ही ऊँचे हों,
पर याद रखना, जड़ें हमेशा ज़मीन से जुड़ी हों।
अहंकार के महलों में, शांति नहीं मिलती कभी,
संतोष की कुटिया में, सुख की वर्षा होती है अभी।

रास्ते में आएँगे संकट, घनेरे अंधकार की तरह,
तुम अडिग खड़े रहना, एक तपे हुए स्वर्ण की तरह।
वक्त की हर ठोकर, तुम्हें टूटना नहीं, संभलना सिखाएगी,
यह रात कितनी भी लंबी हो, सुबह नई किरण ज़रूर लाएगी।

तो विश्राम करो क्षण भर, इस प्रकृति के आंचल में,
ढूंढो अपनी खुशियाँ, जीवन के इस सरल पल में।
ना कल की चिंता करो, ना बीते कल का शोक हो,
यह जीवन एक उत्सव है, बस इसका तुम्हें बोध हो।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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