बडाला गाम के उस रस्ते से, सर का रोज़ ही आना,
रजिस्टर हाथ में लेकर, क्लास में रौब जमाना।
अरे! व्याकरण के वो कड़े नियम भी, खेल-खेल बन जाते थे,
जब सुधीर सर रस की छटा बिखेर, कबीर-तुलसी गाते थे।
अंग्रेजी की क्लास में जब, वो देसी तड़का लाते थे,
'डेंजर' को भी हंसकर जब वो, 'डांगर' बोल बताते थे।
हंस पड़ती थी पूरी क्लास, पर दिल में बात उतरती थी,
किताब की वो मुश्किल भाषा, पल में आसान लगती थी।
कोई सोया-सोया बैठा हो, तो पल में उसे जगा देते,
पीठ पे रख उम्मीद का हाथ, सोया भाग्य उठा देते।
वो कड़क मिज़ाज बस ऊपर का, भीतर तो गंगा बहती थी,
तभी तो उनकी हर एक डांट भी, मिश्री बनकर घुलती थी।
खुशनसीब हैं हम सारे, जो ऐसा गुरुवर पाया है,
जिन्होंने हम जैसे सीधे बालकों को, जीना सिखाया है।
शीश नवाते चरणों में उनके, यही हमारा अर्पण है,
सुधीर सर का ये साया ही, हमारे जीवन का दर्पण है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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