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सियासत का खेल

                
                                                         
                            इंसां इंसां बांट दिया हिंदू-मुस्लिम के नाम पर,
                                                                 
                            
ऊंची दीवारें खींच दीं भाई के दरमियान पर।
आँखों के आँसू सूख गए अपनों के नुक़सान पर,
रोती है इंसानियत आज मन्दिर और मस्तान पर।

उन कालों से तो गोरे अच्छे, जो हाल पूछने आते थे,
अब ये शासक लाठी बरसाएं भूखे के अरमान पर।
उन कालों से तो गोरे अच्छे, जो हाल पूछने आते थे,
अब ये हाकिम लाठी मारें अनशन और ईमान पर।

झूठे वादे, झूठी कसमें, कुर्सी का यह खेल नया,
वोट की ख़ातिर ज़हर घोलते बस्ती के इंसान पर।रोटी-कपड़ा छीन लिया और धर्म का चश्मा पहनाया,
आज अदालत भी चुप बैठी जनता के नुक़सान पर।

मिटा रहे जनता की हस्ती, मरता युवा मैदान पर,
ये हाकिम लाठी बरसाते, भोली-भाली अवाम पर।
झूठे मुक़दमें यहाँ हो जाते, धर्म-जात के नाम पर,
सब कुछ यहाँ पर चल रहा है, झूठे वादों के नाम पर।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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