काँच के महलों में बैठकर जो तकदीरें लिखते हैं,
वो क्या जानें पाँवों के छाले बाज़ारों में बिकते हैं।
सिंहासन पर बैठी ताकत अंधा चश्मा पहने है,
सत्याग्रही की फटी कमीज़ ही उसके सच्चे गहने हैं।
डिजिटल दौर की रैलियों में वो दावे लाख सुनाते हैं,
इधर भूख से बिलखते बच्चे सड़कों पर सो जाते हैं।
जब-जब सत्ता का मद अंधा, अधिकारों को कुचलेगा,
तब-तब सड़कों पर इंकलाब का एक नया सूरज निकलेगा।
ना लाठी से, ना गोली से, यह मौन युद्ध जीता जाएगा,
सच्चाई का एक-एक कतरा इतिहास नया लिख पाएगा।
सिंहासन सुन ले कान खोलकर, तू कल रहे या ना रहे,
पर देश की मिट्टी का मान सदा सत्याग्रही ही बचाएगा।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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