हुई सत्य की जीत यहां पर, ढोल नगाड़ा बजने दो।
घर-घर तीज त्यौहार मनाओ, घी के दीपक जलने दो।
टूट गया अन्याय का किला, मिटा कुहासा साजिश का,
ईमानदार के माथे पर अब, विजय तिलक तुम सजने दो।
घी के दीपक जलने दो,ढोल नगाड़ा बजने दो।
घी के दीपक जलने दो,ढोल नगाड़ा बजने दो।
जन-जन के चेहरे मुस्काए, न्याय की पावन बेला में,
कलियुग के इस विजय पटल पर, खुशियों का रस बहने दो।
झुक गया सर हर बैरी का, चमका सत्य का सूर्य आज,
हर आंगन में गूंजे मंगल, ढोल नगाड़ा बजने दो।
घी के दीपक जलने दो,ढोल नगाड़ा बजने दो।
घी के दीपक जलने दो,ढोल नगाड़ा बजने दो।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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