ये हुस्न-ओ-जमाल तो महज़ एक ढलती परछाईं है,
आज निखरा है, कल मिट्टी में मिल जाना है।
पर जो रूह की गहराइयों में उतर जाए एक बार,
उस पाक मोहब्बत को तो ताउम्र साथ निभाना है।
चाहत-ए-नूर-ए-बदन तो चंद दिनों का तमाशा है,
वक़्त की गर्द में ये चमक ख़ाक हो जाती है।
पर जो बंदगी रूह के सजदों से परवान चढ़े,
वो सिर्फ़ इश्क़ नहीं, ख़ुद में ख़ुदा हो जाती है।
न फ़ासलों का ख़ौफ़ यहाँ, न जुदाई का कोई ग़म,
ये रूहानी राब्ता तो ज़माने की हर बंदिश से आज़ाद है।
जहाँ तसव्वुर-ए-जिस्म की कोई गुंजाइश ही न बचे,
वही दास्तान-ए-इश्क़ कायनात में सदा आबाद है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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