साधन बहुत हैं पास उसके, बड़ा नाम पाया है,
शौक से नहीं वो भूख की आग में समाया है।
तुम्हारी खातिर छोड़ आया बर्फ के पहाड़ को,
पर तुम सुन न पाए इस मौन की दहाड़ को।
उसका क्या बिगड़ेगा? वक्त उसका कट जाएगा,
पर तुम्हारी नस्लों का सारा जीवन डूब जाएगा।
आज जो तमाशा देख, घरों में दुबके बैठे हो,
सोचते हो महफ़ूज़ हो, किस वहम में ऐंठे हो?
कल जो डिग्रियां बिकेंगी खुले आम बाज़ार में,
ढूंढोगे फिर डॉक्टर तुम विपदा की पुकार में।
जो खुद नक़ल की बैसाखी थाम कर आएंगे,
सोचो, वो तुम्हारे अपनों की जान कैसे बचाएंगे?
ये जो कहते फिरते हो कि 'मेरा बच्चा छोटा है',
याद रखना, तुम्हारा यह तर्क बिल्कुल खोटा है।
कोख से जनम लेकर जो इस माटी पर आया है,
इस धरती मां ने सबको एक सूत्र में सजाया है।
हर युवा इस देश का, हर घर का ही चिराग है,
फिर इस गहरी चुप्पी के पीछे छुपा कौन सा दाग है?
उठो पिताओं! माताओं! अब तो इस मौन को तोड़ो,
अपने निज स्वार्थ की सांकल को इस माटी से जोड़ो।
मर गई है चेतना या लहू पानी हो गया?
एक अकेला भूखा है, और तंत्र अभिमानी हो गया?
मिट्टी की गोद से आए, मिट्टी में ही मिल जाना है,
जाने से पहले जग में, इंसानियत का फर्ज़ तो निभाना है!
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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