पत्थर की मूरत सा है ये मर्द, छुपाता पीर है,
एक चोट में जो सह गया, वो खुद ही तक़दीर है।
हँसकर छुपा लेता है आँसू, ज़माने के डर से,
'मज़बूत बन' हर रोज़ कहती, दुनिया इस नर से।
सबकी ख़्वाहिशें पूरी करने में उम्र गुज़र जाती है,
पर उसकी अपनी तकलीफ़ किसी को नज़र कहाँ आती है?
खिलौने से लेकर मकान तक, जो हर हसरत सजाते हैं,
वक़्त आने पर उसी को सब, पल में ठुकराते हैं।
कमाने की मशीन समझकर, उसे गले लगाते हैं ,
पर उसके अंदर के टूटे इंसान को सब भूल जाते हैं।
कोई न पूछे कभी कि उसका, दिल क्या चाहता है,
थक कर चूर जो हो जाए, फिर भी कमाता जाता है।अपनी हसरतों का गला घोंट, जो अपनों के लिए जिए,
उस घायल पंछी के अश्क, भला किसने हैं पिए?
यही कुर्बानियाँ हर रोज़ उसकी, कहानी बयाँ करती हैं,
यही उसकी ख़ामोशी को, समाज का सच बनाती हैं।
मिटाकर खुद का वजूद जो, अपनों का घर सजाता है,
वो मर्द ज़िम्मेदारियों के बोझ तले, इतिहास बन जाता है।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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