वो लकड़ी की डेस्क पुरानी, वो स्याही की शीशी थी,
तेरी-मेरी बात अनोखी, दुनिया की क्या रीती थी।
कभी तू रूठा, कभी मैं रूठा, रूठने में ही एक नशा था,
तूने मनाया, या मैंने मनाया, उस झगड़े में कितना मज़ा था!
तुझे ज़रा सी चोट जो लगती, मेरा जी घबराता था,
मेरा चेहरा उतरा जो देखा, चैन तुझे कहाँ आता था।
वो खट्टी सी नोक-झोंक अपनी, वो हर पल की नादानी थी,
लड़-भिड़कर फिर गले से लगना, अपनी यही कहानी थी।
टीचर का वो क्लास में आना, दिल का धक-धक कर घबराना,
पेट दर्द का मार बहाना, घर पर दोनों का रह जाना!
देख के अपनी पक्की जोड़ी, सारी क्लास का ही जल जाना,
अव्वल नंबर लेकर आना, मिलकर दूसरों को सताना।
रोहित और रविंद्र की जोड़ी को, सबने ही था पहचाना,
टीचर्स ने भी उस समय, अपनी यारी का लोहा था माना।
साथ खड़े जब हम हो जाते, मुश्किल था हमको हराना,
अपनी यारी का था भाई, ऐसा एक अजीब फसाना,
करता हर पल यही दुआ मैं, लौट आए वो समय पुराना!
चॉक चुराकर ब्लैकबोर्ड पर, कार्टून हम बनाते थे,
पीछे वाली बेंच पर बैठकर, सबको रोज़ सताते थे।
पकड़े जाने पर फिर दोनों, चुपके से मुस्काते थे,
मुर्गा बनकर क्लास के बाहर, हम दोनों इतराते थे!
आधी छुट्टी का वो टिफिन, रफ़ कॉपी की वो लड़ाई,
बात-बात पर साथ निभाना, अपनी तो बस यही कमाई!
सोचा न था इस जीवन में, कभी लिखेगी अपनी जुदाई,
क्या वो बातें भूल गया तू, क्या थी बस वो एक विदाई?
फिर एक रोज़ जो घंटी बजी, तू ऐसा भागा दूर कहीं,बदला तूने स्कूल जो अपना, थम सी गई ये दुनिया यहीं।
क्यूँ छोड़ गया तू बीच डगर में, कैसी ये मजबूरी थी?इतनी पक्की थी जो यारी, उसमें क्यूँ ये दूरी थी?
अब मस्ती नहीं रही है, दुखों की एक कतार है,
कहने को तो पूरी क्लास है, पर कोई न सच्चा यार है। स्कूल बदला, पर दिल मत बदलना, यादों का ये संसार है,
लौट आ यार रविंद्र मेरे, इस सूने दिल को इंतज़ार है।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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