रोज़ सुबह कुछ नए चेहरे मिलते हैं,
कुछ देर रुकते हैं, और गुज़र जाते हैं...
जैसे ट्रेन की खिड़की से पेड़ गुज़रते हैं।
दिल हर मोड़ पर एक हाथ
थामना चाहता है,
मगर यहाँ तो सब अपनी मंज़िल
की जल्दी में हैं।
जो भी मिला, बस ज़रूरत की एक शाम
तक रुका।
अब इस उम्र की ढलती हुई धूप में बैठकर,
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो लगता है...
भीड़ तो बहुत है इस छोटी सी जिंदगी में,
पर सच्चे हम दर्द की तलाश में पूरी उम्र गुजर गई।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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