नज़र से अब नज़र को तुम मिलाना छोड़ मत देना,
दिलों के दरमियाँ जो है ज़माना छोड़ मत देना
बुलाया है तुम्हें हमने बड़े ही प्यार से दिलबर,
हमारे पास आने का बहाना छोड़ मत देना।
ज़माने की जफ़ाओं से डराए कोई भी तुमको,
मगर तुम प्यार का पावन फ़साना छोड़ मत देना।
बुझा सकता नहीं कोई हमारे प्यार का सूरज,
कहा जो आज तक तुमने निभाना छोड़ मत देना।
मुसाफ़िर तुम हमारी इस मोहब्बत के सफ़र के हो,
हसीं ये प्यार का अपने ठिकाना छोड़ मत देना।
वफ़ा की राह में 'नादिर' मिले जो दर्द उल्फ़त में,
उसी के नाम पर अपना दीवाना छोड़ मत देना।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X