एक कोमल दस्तक की प्रतीक्षा में है ये वजूद,
वो जो दूर क्षितिज से चुपके से कदम बढ़ाएगी,
मेरे इस नीरस जीवन की मरुभूमि पर,
अमृत की शीतल फुहार सी बरस जाएगी।
उसे बाहरी आवरण को सजाने की ललक नहीं होगी,
वो तो अंतःकरण की गहराइयों को टटोलने आएगी,
जब धुंधलाने लगेंगे मेरे इरादे इस आपाधापी में,
वो मौन प्रेरणा बनकर मेरी रगों में मचल जाएगी।
इस बनावटी समाज के खोखले वादों के बीच,
एक निष्कपट समर्पण का सवेरा लाएगी,
जब दुनिया थमाएगी मेरे हाथों में शिकायतें,
वो बिना कुछ कहे, सिर्फ स्वीकार करन सिखाएगी।
रोहित शर्मा भारद्वाज की धड़कती हर एक सांस में,
एक पवित्र संगीत की तरह जो धीरे से घुल जाएगी,
इस 'नादिर' की समूची हस्ती की सूखी क्यारी को,
वो आकर महकते गुलाबों से महकाएगी।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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