हाँसी की ऐतिहासिक चौखट, वीरों की यह शान है,
हरियाणा की छाती पर चमके, पेटवाड़ मेरा जहान है।
खेतों में लहराती फसलें, हवा में भाईचारे की तान है,
इस पावन माटी के कण-कण में, बसा हुआ स्वाभिमान है।
यहाँ बुजुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ में बसी एक कहानी है,
चौपालों पर सजती बातें, और संस्कृति बड़ी पुरानी है।
धीमी-धीमी धूल उड़े जब, वो गलियाँ याद आती हैं,
बरगद की वो घनी छाँव, अपनी ओर बुलाती है।
इसी धरा की गोदी में, वो अद्भुत इतिहास पला,
टाट-पट्टी के उस स्कूल से, न्याय का एक सूरज निकला।
गर्व से मस्तक ऊँचा होता, जब गूँजता नाम 'सूर्यकांत' है,
देश के सर्वोच्च न्याय-आसन पर, बैठा मेरा पेटवाड़ शांत है।
यह सिर्फ गाँव नहीं मेरा, यह तो एक मिसाल है,
सादा जीवन, ऊँचे सपने, इसका हर रंग बेमिसाल है।
मैं लौट-लौटकर आऊँगा, चाहे जग की दूरी हो,
तेरे आँचल में ही 'नादिर' की, हर एक मन्नत पूरी हो।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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