पावन श्रम की पावन खेती, पर जो डाका डालते,
सपनों के वे क्रूर शिकारी, घूस और रिश्वत पालते।
दिन-रात एक कर छात्र ने जिस, अपनी किस्मत बोई थी,
चंद रुपयों के लालच ने, वह सजल मेधा खोई थी।
चोरी का यह गंदा धंधा, तेरा कल खा जाएगा,
सुनो युवा अब कलम सँभालो, कोई न्याय न लाएगा!
बंद अँधेरे कमरों में जो, अनथक दीपक जलते हैं,
उम्मीदों के कोमल पौधे, भारी कष्ट में पलते हैं।
पन्नों पर बिखरी स्याही का, मोल यहाँ पर शून्य हुआ,
श्रम की पावन इस वेदी पर, छल का यह कारुण्य हुआ।लीक हुआ हर एक पर्चा, मर्यादा बहकाएगा,
सुनो युवा अब कलम सँभालो, कोई न्याय न लाएगा!
गूँगे-बहरे कुछ हाकिम तो, आँख मूँद कर बैठे हैं,
कुर्सी के मद में डूबे वे, अहंकार में ऐंठे हैं।
बिकते देखे ख़्वाब यहाँ पर, सरेआम बाज़ारों में,
सत्य बिलखता देखा हमने, महलों और मीनारों में।
मौन तुम्हारा इन चोरों का, केवल बल बढ़ाएगा,
सुनो युवा अब कलम सँभालो, कोई न्याय न लाएगा!
अब मत बैठो शांत घरों में, उठकर अपनी हुंकार भरो,
इस अन्याय के गढ़ के आगे, निर्भय होकर वार करो।
अपनी इस पावन लेखनी से, नव-युग का निर्माण करो,
सत्य, परिश्रम और न्याय का, जग में फिर सम्मान करो।
तेरा यह विद्रोही तेवर, नया सवेरा लाएगा,
सुनो युवा अब कलम सँभालो, कोई न्याय न लाएगा!
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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