तुमने आने में बहुत देर लगाई,
ये प्राण विकल अब होने लगे हैं।
जब थक कर थमी है मेरी जवानी,
वो ख्वाब कहीं अब सोने लगे हैं।
इस सूनी डगर पर अकेला चला मैं,
न साकी मिला और न प्याला मिला है,
इस जग के अंधेरे में भटका बहुत हूँ,
पर कहीं भी न कोई उजाला मिला है।
शिकायत है तुमसे कि तुम क्यूँ छुपी हो,
क्या मेरे दुखों का तुम्हें भान ही नहीं?
जब दुनिया ने लूटा मेरे सीधेपन को,
क्या तुमको मेरा कोई ध्यान ही नहीं?
इस टूटे हुए दिल के हर एक कोने में,
इन तरसती हुई एकाकी साँसों को सजाने,
अब आ भी जाओ तुम पीर मिटाने,
वो प्यार का अमृत फिर से बहाने।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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