आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मौन प्रतीक्षा की पीर...

                
                                                         
                            तुमने आने में बहुत देर लगाई,
                                                                 
                            
ये प्राण विकल अब होने लगे हैं।
जब थक कर थमी है मेरी जवानी,
वो ख्वाब कहीं अब सोने लगे हैं।

इस सूनी डगर पर अकेला चला मैं,
न साकी मिला और न प्याला मिला है,
इस जग के अंधेरे में भटका बहुत हूँ,
पर कहीं भी न कोई उजाला मिला है।

शिकायत है तुमसे कि तुम क्यूँ छुपी हो,
क्या मेरे दुखों का तुम्हें भान ही नहीं?
जब दुनिया ने लूटा मेरे सीधेपन को,
क्या तुमको मेरा कोई ध्यान ही नहीं?

इस टूटे हुए दिल के हर एक कोने में,
इन तरसती हुई एकाकी साँसों को सजाने,
अब आ भी जाओ तुम पीर मिटाने,
वो प्यार का अमृत फिर से बहाने।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर