मैंने उस किनारे से किनारा कर लिया,
जो कभी मेरा किनारा हुआ करता था।
मैंने उस ठिकाने से अपना रुख मोड़ लिया,
जो कभी मेरी मंज़िल का ठिकाना हुआ करता था।
मैंने उस उजाले की तरफ देखना छोड़ दिया,
जो कभी मेरी रातों का उजाला हुआ करता था।
मैंने उस फ़साने का पन्ना ही पलट दिया,
जो कभी मेरी ज़िंदगी का फ़साना हुआ करता था।
मैंने उस याद के साए से दामन छुड़ा लिया,
जो कभी जीने का बहाना हुआ करता था।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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